26/11 Attack : 5 गोलियां लगने के बाद भी लड़ता रहा ये जवान, जानिए कैसे दी मौत को मात

जालन्धर 31 मई (बृजेश शर्मा) : भारत के मुम्बई शहर में सन 2011 में एक हमला हुआ था। जिसे आज तक कोई भी भूला नही पाया है। यह हमला मुंबई के ताज होटल में आतंकवादियों द्वारा किया गया था। जिसको लेकर भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व भर में इसका शोक मनाया गया था। इस 26/11 हमले मैं जहां भारत के कई जवान शहीद हुए थे वहीं इस हमले में कई लोगों के घरों में भी मातम सा छा गया था। क्योंकि इसमें कई लोग भी मारे गए थे।


आज कुछ हमले के दौरान आतंकवादियों को सबक सिखाने वाले और खुद उनकी गोलियों से घायल होने वाले मरीन कमांडो फोर्स के जवान प्रवीण कुमार ने उस घटना के बारे में जानकारी दी कि किस तरह से उस वक्त माहौल था और क्या-क्या हुआ था।

प्रवीण कुमार ने बताया कि जब हमें इस हमले के बारे में पता चला तब हमारी टीम वहां पर पहुंची। उस टीम को उस वक्त में हैंडल कर रहा था। जब हम ताज में पहुंचे तो वहां पर इतना खून बिखरा हुआ था कि कोई भी उसे देख लेता तो उसी वक्त बेहोश हो जाता। वहां पहुंचने के बाद हमें यह पता चला कि एक जगह पर करीब 100 से अधिक लोग फंसे पड़े हैं जिनको रेस्क्यू करके हमने सही सलामत बाहर निकाला।


जिस दौरान एक आंतकवादी के साथ आमने-सामने फायरिंग हुई। उसी फायरिंग में मुझे 5 गोलियां लगी। प्रवीण कुमार ने यह भी कहा कि आंतकवादीओं के पास AK 47 थी। जिसकी एक गोली भी लग जाए तो कोई भी जिंदा नहीं बच सकता। लेकिन उसकी पांच गोलियां मेरे शरीर में लगी थी। एक गोली मेरे कान में लगी 3 गोलियां मेरी छाती पर लगी थी। क्योंकि उस दौरान खड़े होकर हमारी आमने-सामने फायरिंग चल रही थी।

फायरिंग के दौरान मैंने एक हैंड ग्रेनेड भी उसकी तरफ फेंका था। लेकिन वह हैंड ग्रेनेड फटा ही नहीं अगर उस समय यह हैंड ग्रेनेड फट जाता तो 27 कि सुबह तक यह ऑपरेशन पूरा खत्म हो जाना था । उस दौरान मेरे पास कोई भी ऐसी चीज नहीं थी। जिससे मैं अपने साथियों के साथ संपर्क कर सकता था। एक पल के लिए तो मेरे साथियों ने भी यह सोच लिया कि शायद प्रवीण कुमार शहीद हो गए हैं।


लेकिन उसके बाद जब मेरे साथियों ने मुझे इस हालत में देखा। तो तुरंत वहां से मुझे अस्पताल ले गए। अस्पताल मैं पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने भी यह कह दिया था कि यह अब 3 से 4 दिन का मेहमान ही है। अस्पताल में पहुंचने के बाद नवंबर से लेकर मार्च तक वहीं पर दाखिल रहा।

लेकिन हालत में ज्यादा सुधार ना आने के कारण बाद में धीरे धीरे मुझे किसी साथी ने बताया कि इस से बचने का इलाज अब बाबा रामदेव का योग ही है। क्योंकि योग से ही यह रोग दूर होगा। धीरे-धीरे योग करने के बाद हालत में सुधार आने लगा।


हालत में सुधार आने के बाद मैंने कई जगह मैराथन में भी हिस्सा लिया। भारत का ऐसा पहला डिसएबल मैराथन मैं था। जिसने इस हालत में मैराथन में भाग लेने के बावजूद भी कई जगह से मेडल भी जीते।

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