दुनिया का सबसे भव्य शृंगार, 100 करोड़ के गहनों से सजे राधा-गोपाल
न्यूज़ नेटवर्क 16 अगस्त (ब्यूरो) : भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी पूरे देश में अत्यंत हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। हर साल इस दिन देशभर के मंदिरों में विशेष आयोजन होते हैं। कहीं झूले सजाए जाते हैं, कहीं दही-हांडी फोड़ने की परंपरा निभाई जाती है, तो कहीं राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को अत्यंत भव्य शृंगार से सजाया जाता है। लेकिन इनमें सबसे विशेष और अद्वितीय स्थान रखता है मध्य प्रदेश के ग्वालियर का ऐतिहासिक गोपाल मंदिर जहां जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान राधा-कृष्ण का ऐसा शृंगार किया जाता है, जिसकी भव्यता और विलक्षणता पूरी दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलती।

ग्वालियर के इस मंदिर में हर साल राधा-गोपाल जी को लगभग 100 करोड़ रुपये मूल्य के गहनों से सजाया जाता है। इन गहनों में हीरे, मोती, पन्ना, माणिक, पुखराज और नीलम जैसे बेशकीमती रत्न जड़े होते हैं। यह शृंगार न केवल भक्तों के लिए श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है, बल्कि इसे दुनिया का सबसे महंगा और भव्यतम शृंगार माना जाता है।
गोपाल मंदिर का गौरवशाली इतिहास
ग्वालियर का गोपाल मंदिर किसी साधारण मंदिर की तरह नहीं है, बल्कि यह रियासतकालीन वैभव का एक अनुपम उदाहरण है। इसका निर्माण सन 1921 में ग्वालियर रियासत के तत्कालीन शासक माधवराव सिंधिया प्रथम ने कराया था। माधवराव सिंधिया ने मंदिर के निर्माण के साथ ही भगवान राधा-कृष्ण के लिए विशेष पूजा सामग्री, चांदी के बर्तन और रत्नजड़ित आभूषण भी बनवाए थे।

इन आभूषणों में शामिल हैं—
55 पन्ना जड़ित सात लड़ी का हार,
हीरे और माणिक से सजी सोने की बांसुरी
राधारानी के लिए सोने की नथ, झुमके, चूड़ियां और कड़े
पूजा के लिए चांदी और सोने के बर्तन
इन गहनों को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस दौर में सिंधिया शासकों की भक्ति और समृद्धि किस स्तर की रही होगी।
गहनों का खजाना और बैंक लॉकर की कहानी
स्वतंत्रता से पहले तक राधा-कृष्ण की प्रतिमाएं हमेशा इन्हीं गहनों से शृंगारित रहती थीं। मंदिर में आने वाले भक्त प्रतिदिन भगवान का यह अद्वितीय स्वरूप देखा करते थे। लेकिन देश की आजादी के बाद सुरक्षा कारणों से इन गहनों को बैंक के लॉकर में सुरक्षित कर दिया गया।
लंबे समय तक यह बेशकीमती खजाना लॉकर में ही बंद रहा। फिर साल 2007 में नगर निगम की देखरेख में इन्हें एक बार फिर जन्माष्टमी के अवसर पर बाहर निकाला जाने लगा। तभी से हर साल जन्माष्टमी पर गोपाल मंदिर में इन गहनों को प्रतिमाओं पर पहनाया जाता है और भगवान का भव्य शृंगार किया जाता है।

भगवान के आभूषण: अद्वितीय और अनुपम
जन्माष्टमी के दिन राधा-गोपाल के शृंगार में जो आभूषण सजाए जाते हैं, वे अनमोल और अनुपम हैं। इनमें से कुछ प्रमुख आभूषण इस प्रकार हैं
राधारानी का मुकुट: पुखराज, माणिक और पन्ना रत्नों से जड़ा मुकुट, जिसका वजन लगभग 3 किलो है।
कृष्ण जी का मुकुट: सोने से निर्मित और हीरों से सुसज्जित मुकुट।
मोती का पंचमढ़ी हार: सफेद असली मोतियों से निर्मित।
सात लड़ी का हार: जिसमें 62 असली मोती और 55 पन्ने जड़े हैं।
झुमके, सोने की नथ, कंठी, चूड़ियां और कड़े।
सोने की बांसुरी, जिस पर हीरे और माणिक जड़े हैं।
इसके अतिरिक्त पूजा-अर्चना के लिए भी सोने-चांदी के विशेष बर्तन बनाए गए हैं। इनमें इत्रदान, पिचकारी, चलनी, धूपदान, सांकड़ी, मुकुट कुंभकर्णी, निरंजनी आदि शामिल हैं।
इन सभी आभूषणों और पूजा सामग्री की कुल कीमत आज के समय में लगभग 100 करोड़ रुपये से भी अधिक आंकी जाती है।
सुरक्षा व्यवस्था: 200 से अधिक जवान तैनात
इतने मूल्यवान गहनों को बैंक के लॉकर से निकालकर मंदिर तक लाना और फिर वापस सुरक्षित रखना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। जन्माष्टमी के अवसर पर ग्वालियर प्रशासन इस काम को बेहद सतर्कता और सुरक्षा के बीच अंजाम देता है।
मंदिर के भीतर और बाहर **200 से अधिक पुलिसकर्मी** तैनात किए जाते हैं।
वर्दीधारी पुलिसकर्मियों के साथ-साथ सादा वर्दी में खुफिया अमला भी मौजूद रहता है।
सीएसपी स्तर के अधिकारी पूरे कार्यक्रम की निगरानी करते हैं।
पहले भगवान का शृंगार संपन्न होता है, जिसके बाद नगर निगम कमिश्नर और प्रशासनिक अधिकारी पूजा-अर्चना करते हैं। उसके बाद ही मंदिर के द्वार आम भक्तों के लिए खोले जाते हैं।
भक्तों का उमड़ता जनसागर

जन्माष्टमी के दिन सुबह से ही भक्तों की भीड़ गोपाल मंदिर की ओर उमड़ पड़ती है। सुबह 6 बजे से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगना शुरू हो जाती हैं। हर कोई इस अद्भुत स्वरूप के दर्शन करना चाहता है, क्योंकि साल में सिर्फ एक बार ही भगवान राधा-गोपाल इन बेशकीमती गहनों से सुसज्जित होते हैं।
हजारों-लाखों श्रद्धालु ग्वालियर और आस-पास के इलाकों से ही नहीं, बल्कि देशभर से यहां पहुंचते हैं। दर्शन करने वाले भक्तों का कहना है कि यह स्वरूप इतना आकर्षक और अद्वितीय होता है कि एक बार देखने वाला हमेशा के लिए अभिभूत हो जाता है।
भक्ति और वैभव का अनूठा संगम
गोपाल मंदिर का यह शृंगार सिर्फ आभूषणों का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह भक्ति और वैभव का अनूठा संगम है। सिंधिया राजवंश ने जो परंपरा शुरू की थी, वह आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
एक ओर यह शृंगार भक्तों की आस्था को साकार करता है, तो दूसरी ओर भारतीय कला, शिल्प और रत्नकारी की अद्भुत झलक भी प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि ग्वालियर का गोपाल मंदिर जन्माष्टमी के मौके पर देश-विदेश में चर्चा का विषय बन जाता है।
निष्कर्ष
ग्वालियर का गोपाल मंदिर जन्माष्टमी पर हर साल उस अद्भुत दृश्य का साक्षी बनता है, जिसकी भव्यता को शब्दों में बयान करना कठिन है। राधा-कृष्ण का यह अनुपम शृंगार न केवल भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देता है, बल्कि यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, भक्ति और परंपरा का जीवंत उदाहरण भी है।
साल में एक बार होने वाले इस शृंगार को देखने के लिए लाखों लोग बेसब्री से इंतजार करते हैं। भक्तों का कहना है कि इस अद्वितीय रूप को देखने के बाद मन में ऐसी शांति और आनंद की अनुभूति होती है, जो जीवनभर याद रहती है।
यही कारण है कि ग्वालियर का गोपाल मंदिर और यहां होने वाला जन्माष्टमी का शृंगार पूरे विश्व में सबसे भव्य और अनोखा माना जाता है।


