बॉडी बिल्डर वरिंदर घुम्मन की मौत का मामला गरमाया, फोर्टिस के चार डॉक्टरों पर केस दर्ज

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पिछले साल सर्जरी के दौरान अस्पताल में हुई थी मौत

न्यूज नेटवर्क 21 मार्च (ब्यूरो) : अमृतसर के एक निजी अस्पताल में अंतरराष्ट्रीय बॉडी बिल्डर वरिंदर सिंह घुम्मन की मौत का मामला अब कानूनी मोड़ ले चुका है। इस प्रकरण में पुलिस ने चार वरिष्ठ डॉक्टरों के खिलाफ केस दर्ज किया है। यह कार्रवाई उस समय की गई जब स्पेशल मेडिकल बोर्ड की जांच रिपोर्ट में इलाज के दौरान गंभीर लापरवाही के संकेत मिले।

 

जानकारी के मुताबिक, घुम्मन को कंधे में मामूली चोट के चलते 9 अक्टूबर 2025 को सर्जरी के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का कहना है कि यह एक सामान्य प्रक्रिया थी, लेकिन ऑपरेशन के दौरान अचानक हालात बिगड़ गए और उनकी मौत हो गई। परिवार ने शुरू से ही डॉक्टरों पर लापरवाही के आरोप लगाए थे, जिसके बाद मामले की गहन जांच के लिए मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया।

जांच रिपोर्ट में कई अहम खामियां सामने आई हैं। इसमें बताया गया कि सर्जरी के दौरान जरूरी मेडिकल प्रोटोकॉल का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। विशेष रूप से एसीएलएस (Advanced Cardiac Life Support) जैसे मानकों में कमी पाई गई। इसके अलावा, सर्जरी के दौरान संभावित जोखिमों और ऑपरेशन के समय में हुई बढ़ोतरी के बारे में भी मरीज के परिवार को सही और पूरी जानकारी नहीं दी गई।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि मरीज की ईसीजी रिपोर्ट में लेफ्ट वेंट्रिकुलर स्ट्रेन के संकेत थे, जो हृदय से जुड़ी संभावित समस्या की ओर इशारा करते हैं। इसके बावजूद किसी कार्डियोलॉजिस्ट की सलाह नहीं ली गई और न ही 2डी ईको जैसी जरूरी जांच करवाई गई। आपात स्थिति के दौरान अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों को बुलाया जरूर गया, लेकिन मेडिकल रिकॉर्ड में उनके इलाज से संबंधित कोई स्पष्ट लिखित विवरण दर्ज नहीं पाया गया, जो कि गंभीर लापरवाही मानी जा रही है।

मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और कानूनी सलाह के आधार पर पुलिस ने ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. तपिश शुक्ला, एनेस्थीसिया कंसल्टेंट डॉ. अलका तिवारी, एनेस्थीसिया विभाग की प्रमुख डॉ. रजिंदर कौर और कार्डियोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. अरुण कुमार चोपड़ा को नामजद किया है। सभी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 106(1) के तहत थाना सदर में मामला दर्ज कर लिया गया है।

यह मामला अब न सिर्फ मेडिकल लापरवाही का उदाहरण बन गया है, बल्कि निजी अस्पतालों में इलाज की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी कई सवाल खड़े कर रहा है। आने वाले समय में पुलिस जांच और कानूनी प्रक्रिया के जरिए यह साफ हो सकेगा कि इस मामले में किस स्तर तक जिम्मेदारी तय होती है।

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